पाठ्यक्रम: GS3जैव प्रौद्योगिकी, GS4/ एथिक्स
संदर्भ
- गैर-पशु परीक्षण मॉडल (NAMs) पारंपरिक पशु-आधारित परीक्षणों के वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय विकल्प एवं पूरक के रूप में उभर रहे हैं। ये भारत को अपने औषधीय नवाचार पारितंत्र को अधिक सुदृढ़ बनाने का अवसर प्रदान करते हैं।
गैर-पशु परीक्षण मॉडल (NAMs) क्या हैं?
- गैर-पशु परीक्षण मॉडल (NAMs) ऐसी वैज्ञानिक पद्धतियाँ हैं, जिनमें मानव-संबंधी जैविक प्रणालियों तथा संगणकीय तकनीकों का उपयोग करके औषधियों एवं रसायनों की सुरक्षा, प्रभावकारिता तथा विषाक्तता संबंधी जानकारी प्राप्त की जाती है, जिससे केवल पशु परीक्षणों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं रहती।
- NAM प्लेटफॉर्म के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं:
- ऑर्गेनॉइड: मानव स्टेम कोशिकाओं से विकसित लघु त्रि-आयामी संरचनाएँ, जो मानव अंगों की संरचना एवं कार्यप्रणाली की नकल करती हैं।
- ऑर्गन-ऑन-ए-चिप प्रणालियाँ: सूक्ष्म द्रविकी उपकरण, जो मानव ऊतकों के शारीरिक वातावरण तथा विभिन्न अंगों की पारस्परिक अंतःक्रियाओं का पुनर्निर्माण करते हैं।
- त्रि-आयामी मानव कोशिका संवर्धन मॉडल: उन्नत कोशिकीय प्रणालियाँ, जो पारंपरिक द्वि-आयामी कोशिका संवर्धन की तुलना में मानव ऊतकों के व्यवहार का अधिक यथार्थ अनुकरण करती हैं।
- संगणकीय विषविज्ञान: कंप्यूटर-आधारित मॉडल, जो जैविक एवं रासायनिक आँकड़ों के आधार पर रसायनों की विषाक्तता तथा औषधियों की प्रतिक्रिया का पूर्वानुमान लगाते हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित मॉडल: यंत्र अधिगम प्रणालियाँ, जो विशाल जैव-चिकित्सीय आँकड़ों का विश्लेषण कर मानव शरीर में औषधियों की संभावित प्रतिक्रिया का पूर्वानुमान करती हैं।
परिवर्तन की आवश्यकता के कारण
- पारंपरिक पशु परीक्षणों की सीमाएँ: पशुओं की शरीर क्रिया, चयापचय, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया तथा रोग-तंत्र मनुष्यों से भिन्न होते हैं।
- परिणामस्वरूप, पारंपरिक पशु मॉडल अक्सर मानव शरीर की जैविक प्रतिक्रियाओं का सटीक पूर्वानुमान नहीं लगा पाते।
- औषधि विकास की चुनौती: वैश्विक स्तर पर प्रथम चरण के नैदानिक परीक्षणों में प्रवेश करने वाली औषधि अभ्यर्थियों में से केवल लगभग 10–14 प्रतिशत को ही अंततः नियामकीय स्वीकृति प्राप्त होती है।
- इसका एक प्रमुख कारण यह है कि कुछ पूर्व-नैदानिक मॉडल मानव शरीर में सुरक्षा एवं प्रभावकारिता का विश्वसनीय पूर्वानुमान लगाने में सक्षम नहीं होते।
- नैतिक पक्ष: NAMs के उपयोग से जीवित पशुओं (जैसे कृंतक एवं प्राइमेट) पर किए जाने वाले पीड़ादायक अथवा घातक परीक्षणों की आवश्यकता में उल्लेखनीय कमी आती है अथवा उन्हें पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है।
- भारत की वर्तमान क्षमता: भारत के पास एक सुदृढ़ जेनेरिक औषधि उद्योग है, जिसके कारण वह विश्व को किफायती दवाओं की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है।
- किंतु भविष्य में औषधि उद्योग की वृद्धि केवल बड़े पैमाने पर विनिर्माण पर नहीं, बल्कि नवाचार-आधारित मूल्य सृजन पर अधिक निर्भर करेगी।
NAMs को अपनाने की वैश्विक प्रवृत्तियाँ
- संयुक्त राज्य अमेरिका: अमेरिका ने (FDA) आधुनिकीकरण अधिनियम 2.0 पारित किया है, जिसके माध्यम से नई औषधियों के लिए अनिवार्य पशु परीक्षण संबंधी दशकों पुरानी संघीय आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया है।
- यूरोपीय संघ: यूरोपीय संघ ने (REACH) ढाँचे के अंतर्गत सुरक्षा परीक्षणों हेतु एक समेकित दृष्टिकोण अपनाया है।
- यूरोपीय आयोग एवं यूरोपीय रसायन एजेंसी (ECHA) ने रासायनिक सुरक्षा आकलन हेतु पशु परीक्षणों को पूर्णतः समाप्त करने के लिए एक व्यापक रोडमैप अपनाया है।
- यूनाइटेड किंगडम: यूनाइटेड किंगडम ने मानव-प्रासंगिक परीक्षण तकनीकों के विकास हेतु राष्ट्रीय केंद्रों एवं अनुसंधान नेटवर्क की स्थापना की है।
- इस क्षेत्र में (NC3Rs) प्रमुख संस्था के रूप में कार्य कर रही है।
- जापान: जापान ने (JaCVAM) के माध्यम से वैकल्पिक परीक्षण पद्धतियों एवं विषविज्ञान अवसंरचना के विकास में निवेश किया है।
भारत में NAMs के उपयोग का विकास
- जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) ने ऑर्गेनॉइड मॉडल, इन-विट्रो प्रणालियाँ, त्रि-आयामी मुद्रित मॉडल, कोशिका चिकित्सा, औषधि खोज, पूर्व-नैदानिक मॉडल तथा रोग-रोगजनन के अध्ययन हेतु कोशिका-आधारित मॉडलों के विकास को प्रोत्साहित किया है।
- केनोरहैब्डाइटिस एलिगेंस (C. एलिगेंस), ड्रोसोफिला मेलानोगास्टर, ज़ेब्राफिश तथा यीस्ट-आधारित मॉडल को विषविज्ञान, रोग मॉडलिंग एवं औषधि परीक्षण में अपनाया गया है।
- भारत ने वर्ष 2023 में नई औषधि एवं नैदानिक परीक्षण नियम, 2019 में संशोधन कर औषधि विकास प्रक्रिया में गैर-पशु परीक्षण मॉडल (NAMs) को औपचारिक मान्यता प्रदान की।
भारत के लिए अवसर
- बौद्धिक संपदा सृजन सुदृढ़ीकरण: उन्नत परीक्षण प्लेटफॉर्म मौलिक औषधि खोज, नवीन जैविक औषधियों तथा स्वामित्वाधिकार-आधारित प्रौद्योगिकियों के विकास को प्रोत्साहित करते हैं।
- इससे भारत अधिक सशक्त पेटेंट एवं नवाचार-आधारित बौद्धिक संपदा का सृजन कर सकेगा।
- भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता: मानव-प्रासंगिक परीक्षण तकनीकों को शीघ्र अपनाने से अंतरराष्ट्रीय सहयोग, निवेश तथा उच्च-मूल्य अनुसंधान परियोजनाओं को आकर्षित किया जा सकता है।
- इससे भारत वैश्विक स्तर पर औषधि खोज एवं जैव-चिकित्सीय नवाचार का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।
आगे की राह
- भारत को चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाते हुए NAMs को जेनेरिक औषधियों के गुणवत्ता मूल्यांकन एवं जैव-सदृश औषधियों के विकास में एकीकृत करना चाहिए, ताकि वर्तमान विनिर्माण प्रणाली प्रभावित न हो।
- NAMs के लिए स्पष्ट सत्यापन प्रोटोकॉल, आँकड़ा स्वीकृति दिशा-निर्देश तथा नियामकीय एजेंसियों, उद्योग एवं अनुसंधान संस्थानों के मध्य समन्वय सुनिश्चित करते हुए एक राष्ट्रीय नियामकीय ढाँचा विकसित किया जाना चाहिए।
- NAMs को प्रारंभिक स्तर पर अपनाने से भारत नवोन्मेषी औषधि खोज, अनुप्रयुक्त अनुसंधान तथा आगामी पीढ़ी के औषधि विकास के लिए वैश्विक स्तर पर एक पसंदीदा गंतव्य के रूप में स्थापित हो सकेगा।
स्रोत: TH
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